नही रहे चंबल के 400 हत्या और 650 अपहरण करने वाले डाकू मोहर सिंग : पढे पूरी खबर

नही रहे चंबल के 400 हत्या और 650 अपहरण करने  वाले डाकू मोहर सिंग : पढे पूरी खबर

गवालियर: डकैतों के आतंक की कहानियों के लिए कुख्यात चम्बल घाटी में अपने आतंक की अनगिनत कहानियों और पौराणिकताओं को लिखने वाले आत्मसमर्पित डकैत सरगना मोहर सिंह का आज निधन हो गया है। वे 92 साल के थे। साठ से लेकर सत्तर के दशक तक चम्बल में दो सबसे बड़े समर्थकों में मोहर सिंह और माधो सिंह थे। मोहर सिंह ने 1972 में अपने सहयोगियों के साथ पगारा बांध परजयप्रकाश नारायण से भेंट की और फिर 14 अप्रैल 1972 को गांधी सेवा आश्रम जौरा जिला मुरेना में अपने सहयोगियों सहित गांधी जी की तस्वीर के सामने हथियार रखकर आत्मसर्मपण कर दिया। उस समय मोहर सिंह पर एमपी, यू.पी., मूल्यांकन आदि राज्यो की पुलिस ने दो लाख रुपये का इनाम घोषित किया था जिसका आज के अनुसार मूल्यांकन दस करोड़ से अधिक है। मोहर सिंह के खिलाफ देश के विभिन्न थानों में तीन सौ से अधिक हत्या के मामले दर्ज थे लेकिन बकौल मोहर सिंह ये गिनती बहुत कम है। नगर पालिका अध्यक्ष भी बने आत्मसमर्पण के बाद मोहर सिंह ने भिंड जिले के मेहगांव कस्बे को अपना घर बनाया और उसी रहने लगे। वे दाढ़ी रखते थे इसलिए वे वहाँ दाढ़ी के नाम से ही विख्यात थे। वे हँसमुख और मिलनार ठगे इसलिए हर उम्र के लोगों में उनकी खासी लोकप्रियता थी। यह इतना अधिक था कि वे एक बार नगर पालिका मेहगांव के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़े और निर्दलीय ही जीत गए। उंन्होने इस दौरान विकाज़ के काम भी कराए। लोगो ने उन्हें फिर से चुनाव लड़ने को भी कहा तो उन्होंने मना कर दिया। कैसे बने डकैत अपने समय के सबसे खूंखार डकैत मोहर सिंह ग्राम जटेपुरा गांव में दबंगो ने उनकी जमीन छुड़ा ली और पुलिस से मिलीभगत करके बन्द भी करा दिया। इसके बाद मोहर सिंह डकैत हो गए और फिर उन्होंने अपने आतंक से पूरे उत्तर भारत को दहलाकर रख दिया। तिरपान के समय इसके गैंग में 37 लोग थे। जब मोहर सिंह गैंग नेप्रिंटन किया तब उज़के पास सभी अटारी हथियार थे जो पुलिस के पास भी नहीं थे। ये हथियार किए गए थे समर्पण करते समय मोहर सिंह 37 साल का था। वह पूरी तरह से निरक्षर थी। बकौल उसके-हमने तो स्कूल का मुंह भी नहीं देखा। उन्होंने जबपटान किया तो एक एसएलआर, तोलमी गान, 303 बोर चार रायफल, नेवटिक चार एलएमजी, लंदन, मार्क 5 रायफल सहित भारी असलाह गांधी के चरणों मे रखे। जेल भी काटी और फ़िल्म में हूर भी बने मोहर सिंह और माधो सिंह कहने को तो अलग-अलग सहयोगियों थे लेकिन दोनों के बीच खूब याराना था। मोहर सिंह द्वारा माधो सिंह का बहुत कुछ किया गया था। दोनों गैंग ने एक साथ आत्मसमर्पण किया और फिर जेल में रहकर मुकद्दमे बसाने के बाद ही बाहर आये। बाद में चम्बल केबार नाम से एक फ़िल्म भी बनी हुई है जिसमें मोहर सिंह और माधो सिंह दोनों ने अपनी भूमिकाएं भी निभायी हैं।