पंचमुखी महादेव, ऐसे समझे पंच कोश को

भौरा:-अग्निहोत्री निवास पर स्थापित पंचमुखी महादेव की प्रतिमा के दर्शन पुजन के लिए आज गुरुवार को सायंकाल से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया। शिव पंडाल पर गुरुवार पंचमी तिथि पर 51 कन्याओं द्वारा भव्य आरती की गई। जिसे देखने के लिए सड़कों पर श्रद्धा का जो सैलाब उमड़ा। इस महा आरती में इटारसी के समाजसेवी सुनील तिवारी, श्रीमती यशरानी तिवारी, ऐश्वर्या राजलक्ष्मी तिवारी, मुस्कान पटेल सहित अनेक लोग सम्मिलित हुए। शिव पंडाल पर अपार आन्नद व उर्जा से लबरेज बच्चे अपने माता-पिता का हाथ पकड़ कर कौतूहल भरे नजरों से पंडालों का सौन्दर्य तो कहीं जगमग करती रंगबिरंगे बल्बों से सुसज्जित मार्ग के सौंदर्य को निहारते स्त्री-पुरुष बच्चे नजर आ रहे है।अग्निहोत्री निवास स्थित मंदिर परिसर में भगवान गणेश की एक पंचमुखी प्रतिमा स्थापित है जिस कारण से इसे पंचमुखी गणेश जी के नाम से पुकारा जाता है। यहां स्थापित गणेश जी की यह प्रतिमा नगर की प्रसिद्ध प्रतिमाओं में से एक है। किसी मंदिर परिसर में नवरात्रि के पावन अवसर पर भगवान शिव की पंचमुखी प्रतिमा विराजित की जिसे देखने के लिए प्रतिदिन भक्तों का तांता लगा रहता है। पंडाल परिसर की आकर्षण साज सज्जा लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई जिसे देखने के लिए भक्त अपने परिवार के साथ आ रहे हैं।आज नवरात्रि की पंचमी तिथि है इस मौके पर पंचमुखी गणेश मंदिर पर विराजे पंचमुखी महादेव पंडाल पर भक्तों की काफी भीड़ दिखी. हर तरफ लोग शिव की धुन में रमे नजर आ रहे थे पंचमुखी भोले शंकर की पूरे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की जाए तो भक्‍त की हर मनोकामना पूरी होती है,। पंचमुखी भगवान गणेश मंदिर की ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त इस मंदिर मैं 11 बुधवार आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है ये मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है। यहां आने से श्रद्धालुअों की प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है। बाकी दिनों के अतिरिक्त गणेश उत्सव, नवरात्रि पर भक्तों की भीड़ बहुत अधिक होती है।   मंदिर में भगवान गणेश के साथ-साथ शिव परिवार की सभी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर में इन सभी प्रतिमाओं की स्थापना पंचमुखी गणपति की स्थापना के साथ की गई थी। पांच मुख वाले शिव व गजानन को पंचमुखी कहा जाता है। यहां पंच का अर्थ पांच और मुखी का मतलब मुंह से है। ये पांच कोश के भी प्रतीक हैं। वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के माध्यम से समझाया गया है। इन पंचकोश को पांच तरह का शरीर भी कहा गया है। ऐसे समझे पंच कोश को- 1. अन्नमय कोश- यह पहला कोश है इसके तहत संपूर्ण जड़ जगत जैसे धरती, तारे, ग्रह, नक्षत्र आदि आते हैं। 2. प्राणमय कोश- यह दूसरा दूसरा कोश है, जिसके तहत जड़ में प्राण आने से वायु तत्व धीरे-धीरे जागता है और उससे कई तरह के जीव प्रकट होते हैं। इसे ही प्राणमय कोश कहते है। 3. मनोमय कोश- यह तीसरा कोश है, इसके तहत प्राणियों में मन जाग्रत होता है और जिनमें मन अधिक जागता है वही मनुष्य बनता है। 4. विज्ञानमय कोश- इस चौथे कोश के अंतर्गत सांसारिक माया भ्रम का ज्ञान जिसे प्राप्त हो। सत्य के मार्ग चलने वाली बोधि ही विज्ञानमय कोश में होता है। यह विवेकी मनुष्य को तभी अनुभूत होता है जब वह बुद्धि के पार जाता है। 5. आनंदमय कोश- पांचवे कोश में कहा जाता है कि इस कोश का ज्ञान प्राप्त करने के बाद मानव समाधि युक्त अतिमानव हो जाता है। मनुष्यों में शक्ति होती है, भगवान बनने की और इस कोश का ज्ञान प्राप्त कर वह सिद्ध पुरुष होता है। जो मानव इन पांचों कोशों से मुक्त होता है, उनको मुक्त माना जाता है और वह ब्रह्मलीन हो जाता है। गणेश जी के पांच मुख सृष्टि के इन्हीं पांच रूपों के प्रतीक हैं। पंचमुखी गणेश चार दिशा और एक ब्रह्मांड के प्रतीक भी माने गए हैं अत: वे चारों दिशा से रक्षा करते हैं। वे पांच तत्वों की रक्षा करते हैं। घर में इनको उत्तर या पूर्व दिशा में रखना मंगलकारी होता है